आज 25 जुलाई 2026 को देश की शिक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा पर्दा गिरा। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना त्यागपत्र भेज दिया। जंतर-मंतर पर हफ्तों से डटे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के युवाओं के दबाव के आगे सत्ता को झुकना पड़ा।
प्रधान ने अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर दो पेज का पत्र जारी किया। पत्र में उन्होंने साफ लिखा—जंतर-मंतर और देश में बनी स्थिति को देखते हुए, ताकि राष्ट्र-विरोधी ताकतें फायदा न उठाएं, देश की एकता बनी रहे और किसी भी छात्र का भविष्य कानूनी उलझनों में न फंसे, उन्होंने अपना त्यागपत्र प्रधानमंत्री को भेज दिया है।
यह इस्तीफा अचानक नहीं आया। मई 2026 में NEET-UG परीक्षा रद्द हुई। 2.27 लाख से ज्यादा छात्र प्रभावित हुए। सिकर, लातूर, पुणे के कोचिंग नेटवर्क और NTA के अंदरूनी लोगों के जरिए सवाल लीक हुए। सीबीआई ने कई गिरफ्तारियां कीं। कई छात्र आत्महत्या कर बैठे। री-एग्जाम हुआ, लेकिन विश्वास टूट चुका था।
जून से जंतर-मंतर पर युवा बैठे। सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर गए। 20 जुलाई को संसद की ओर मार्च पर लाठियां चलीं। विपक्ष संसद में शोर मचाता रहा। सरकार बार-बार कहती रही—इस्तीफे का सवाल ही नहीं। “मंत्री जिम्मेदार नहीं”, “इस्तीफा भागना है”—यही लाइन थी।
लेकिन दबाव इतना बढ़ा कि आखिरकार प्रधान को पत्र लिखना पड़ा। पत्र में वे युवाओं की आकांक्षाओं का सम्मान जताते हैं, अपनी चार दशक की सेवा का जिक्र करते हैं और कहते हैं कि उन्होंने शुरू से जिम्मेदारी ली। लेकिन सवाल यह है कि जब सिस्टम इतने बड़े स्तर पर फेल हो चुका था, तो नैतिक जिम्मेदारी लेने में इतनी देर क्यों लगी?
यह इस्तीफा सिर्फ एक मंत्री का नहीं है। यह उस व्यवस्था की हार है जो बार-बार पेपर लीक होने देती है, छात्रों को मौत के मुंह में धकेलती है और फिर कुर्सी बचाने में लगी रहती है। NTA की विश्वसनीयता खत्म हो चुकी थी। परीक्षा माफिया फल-फूल रहा था। और शीर्ष पर बैठे लोग “सुधार” के वादे करते रहे।
युवाओं ने साबित कर दिया कि जब सत्ता अहंकार में डूब जाती है, तो सड़क की ताकत उसे झुका सकती है। लेकिन यह जीत महंगी पड़ी। कई परिवार बिखर चुके। कई सपने अधूरे रह गए। इस्तीफे से परीक्षा की साख वापस नहीं आएगी। न ही उन छात्रों को जीवन मिलेगा जिन्होंने इस व्यवस्था के आगे हार मान ली।
अब सवाल यह है कि नया शिक्षा मंत्री क्या बदलेगा? कंप्यूटर बेस्ड परीक्षा का वादा पहले भी हो चुका। सख्त कानून का ऐलान भी। लेकिन जब तक परीक्षा तंत्र को जड़ से साफ नहीं किया जाएगा, लीक बंद नहीं होंगे। और जब तक सत्ता नैतिक जिम्मेदारी को “भागना” समझती रहेगी, युवा सड़कों पर ही रहेंगे।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा एक अध्याय का अंत है। लेकिन शिक्षा व्यवस्था के घाव अभी भी खुले हैं। जंतर-मंतर के उन ‘कॉकरोचों’ ने आज साबित कर दिया—जब युवा एकजुट होते हैं, तो सत्ता की कुर्सी भी हिल जाती है। अब देखना है कि सत्ता इस सबक को कितना समझती है।
"The decisions we make today will shape the world for generations to come."







